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1.
नागरिक चार्टर (1997), सार्वजनिक सेवा अधिकार अधिनियम (2011) और मैसूर घोषणा-पत्र (2021) जैसे सुधारों ने ग्राम पंचायत स्तर पर नागरिकों को आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराई हैं, लेकिन बदलते वक्त के साथ अब इनके विस्तार की जरूरत महसूस की जा रही है। खासतौर पर जब्ब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित बनाने का लक्ष्य तय किया है तो गांवों में ईज आफ लिविंग बढ़ाने को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस दिशा में प्रयासरत पंचायतीराज मंत्रालय ने जब राज्यों की भागीदारी रखते हुए एक केंद्रीय समिति गठित की तो विमर्श-परामर्श की प्रक्रिया में सुधारों को लेकर राज्य काफी उत्सुक नजर आए। समिति ने कोर कामन सर्विस (अनिवार्य सेवाएं) की सूची को जहां 50 तक करने की सिफारिश की है, वहीं राज्यों ने सेवाओं की संख्या 70 से अधिक करने का सुझाव दिया है। पंचायतीराज मंत्रालय इन सिफारिशों सुझावों के आधार पर ब्लूप्रिंट तैयार कर अब अधिक नागरिक सेवाओं को ग्राम पंचायत स्तर पर अनिवार्य कर सकता है।
2.
ढाका में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सत्ता में वापसी भारत की पूर्वी पड़ोस नीति में एक बड़ा बदलाव है। अगस्त 2024 से बांग्लादेश में लगातार राजनीतिक अस्थिरता, संस्थागत दबाव और सामाजिक ध्रुवीकरण देखा गया है। अब नई दिल्ली के सामने चुनौतियां और अवसर दोनों है, यह समय संतुलित और व्यावहारिक कूटनीति अपनाने का है।
3.
भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआइ ने बीते दिनों बैंकों के लिए माइक्रो एंड स्माल एंटरप्राइजेज (एमएसई) को गिरवी मुक्त या बिना किसी गारंटी के ऋण देने की सीमा को 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दिया। इस वर्ष अप्रैल के बाद से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) को दिए जाने वाले ऋण पर रिजर्व बैंक का यह फैसला प्रभावी होगा। 'क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फार माइक्रो एंड स्माल एंटरप्राइजेज' ऋण लेने वाले उद्यमियों की गारंटी लेगा। निश्चित रूप से आरबीआइ की यह है पहल एमएसएमई को बढ़ावा देने के लिए एक कारगर पहल सिद्ध होगी। ध्यातव्य रहे कि इस बार के बजट में वित्त मंत्री ने एमएसएमई की क्रेडिट सुविधा बढ़ाने और उनके लिए अलग से 10,000 करोड़ रुपये का फंड बनाने की घोषणा की है। आर्थिक समीक्षा 2025-26 बताती है कि एमएसएमई भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं। यह क्षेत्र देश के कुल विनिर्माण उत्पादन का 35.4 प्रतिशत, कुल निर्यात का 48.58 प्रतिशत और जीडीपी का 31.1 प्रतिशत योगदान करता है।
4.
अगर आप डायबिटीज के लिए एचबीए। सी टेस्ट पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, तो सावधान हो जाएं क्योंकि भारत जैसे देश में ये परीक्षण हर बार सही नतीजा देगा, ये तय नहीं है। द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथईस्ट एशिया जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि भारत जैसे देश में, जहां खून की कमी (एनीमिया) और कुछ अनुवांशिक रक्त बीमारियां ज्यादा पाई जाती हैं, वे इस टेस्ट की रिपोर्ट में उतार-चढ़ाव कर सकती हैं। इसके चलते कभी-कभी डायबिटीज का पता लगाने में चार साल तक की देरी हो सकती है। इसका खामियाजा खासकर महिलाओं और ग्रामीण आबादी को भुगतना पड़ सकता है।

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